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संघ भवन

लगभग 1968 तक डि.इं. संघ लो.नि.वि. उ.प्र. का कोई निश्चित घर नहीं था। कभी इधर तो कभी उधर। कभी पी.डब्लू.डी. के वर्तमान निर्माण भवन के किसी कमरे में, तो कभी दारुलशफा के किसी कमरे में। स्वाभाविक है कि जिसका कोई घर नहीं, उसका कोई दर नहीं। उसका कोई आदर नहीं…।

 

कभी रेल, कभी जहाज बीच,

कभी पैदल चली जिन्दगी

कभी बेदर, तो कभी बेघर

कभी घर में पली जिन्दगी

कभी रुठी, यह, भटकी कभी

कभी सबसे जुड़ी जिन्दगी

कभी भीड़, कभी हमसफर कुछ

                                   अमरनाथ

सन 1975 में संघ ने अपना भवन बनाने का प्रस्ताव पारित किया। बाद में संघ ने अपने पत्रांक 32 ईएसए/13 दिनांक 12.2.60 द्वारा शासन एवं विभाग से भवन हेतु भूमि उपलब्ध कराने का अनुरोध किया। भवन कोष की स्थापना की गयी। संघ के 31वें अधिवेशन दिनांक 23.5.65 तक इस मद में 7280/- एकत्रित किये जा सके। विभागीय मुख्य अभियंता से जमीन उपलब्ध कराने की बातें की जाती रहीं। मुख्य अभियंता सा.नि.वि. ने अपने पत्रांक 209 ईडी जी दिनांक 14.9.66 द्वारा विभागीय सचिव को सम्बोधित करते हुए संघ को सूचित किया कि-

Land will be handed over to the Association as soon as it is acquired in NIRALA NAGAR, for office and Houses.

संघ भवन के निर्माणार्थ निरालानगर लखनऊ में भूमि उपलब्ध कराने की विभाग द्वारा बात की गई। परन्तु संघ उस भूमि क्को  लेने को तैयार नहीं हुआ। बाद में मुख्य अभि. के आदेश सं. 8851/सी.बी. दिनांक 25.1.69 द्वारा स्थल आवंटित हुआ। जहाँ पर वर्तमान संघ भवन बना हुआ है। संघ भवन का शिलान्यास 2 अक्टूबर 1961 को पृथ्वी नाथ श्रीवास्तव मुख्य अभियंता द्वारा किया गया। भूमि को दिलाने में तत्कालीन उप मुख्य अभियंता जी.डी. माथुर जी का विशेष सहयोग रहा। संघ में उस समय श्री पी.सी. गुप्ता अध्यक्ष तथा इं. दिनेश प्रसाद सिंह महामन्त्री थे। 12.9.70 को संघ ने एक पाँच सदस्यीय भवन समिति का गठन किया जिसमें इं. के.सी. गर्ग, एन.एल. गुप्ता, आ.पी. गुप्ता, एस.के.डी. अग्रवाल तथा एन.पी. गुप्ता थे।

      शिलान्यास के पश्चात भी सदस्यों ने कोई बहुत अधिक रुचि नहीं दिखाई। यद्यपि श्री आर.के.जैन ने काफी प्रयास किए, परन्तु सदस्यों की रुचि कम होने एवं धनाभाव के कारण उन्होंने 1972 में इसके निर्माण से हाथ खींच लिया। 1976 तक भवन की प्रगति बहुत धीमी रही। बाद में इस कार्य का दायित्व लिया इं. सतीश चन्द्र सक्सेना, एन.पी. निराला, सी.बी. गुप्ता, बी.एन. तिवारी एवं कपिल देव द्विवेदी ने। सन 1973 की दीपावली से पुनः यह कार्य चालू हुआ। वर्ष 1977-78 तक दो कमरे, स्नानागार, बाहरी बरामदा तथा सभागार की दीवारें बन चुकी थीं। इं. आर.के. वर्मा के महामंत्रीत्व काल में इसकी एप्रोच रोड बनी तथा सभागार का उदघाटन माननीय ध्यान प्रकाशराय जी द्वारा किया गया। यद्यपि 1977 में इं. जे.एन. श्रीवास्तव ने महामंत्री की हैसियत से पहली बार इस संघ भवन के निर्मित कमरे में विधिवत कार्य शुरु हुआ। संघ के 51वें अधिवेशन 14-16 जून 1970 को प्रथम तल की चार डोरमेट्री, तथा दो परिवार कक्ष बनाकर सदस्यों के उपयोग के लिये खोल दिये गये। उसी वर्ष संघ भवन में टेलीफोन की व्यवस्थ भी करा ली गयी। मात्र 1971-80 में ही इसके निर्माण पर 1,17,881/- व्यय किये गये जो उस समय के हिसाब से विशाल राशि थी। इससे पहले 1.74 लाख रुपये और खर्च किये जा चुके थे। वर्ष 1980 व 1982 के बीच जल आपूर्ति हेतु नलकूप, पम्प हाऊस का निर्माण एवं दो फेज विद्युत कनेक्शन की व्यवस्था करायी जा चुकी थी। कार्यालय कक्ष, बरामदा, ग्रीन रूम बन चुका था। वर्ष 1986 तक संघ भवन पूरी तरह से बनकर साज-सज्जायुक्त हो चुका था। बाहरी तरफ कैफेटेरिया का भी निर्माण कार्य प्ररम्भ हो गया था। 1988 के मध्य क्षेत्र ने इसी भवन के बाहरी कोने पर कैफेटेरिया के ऊपर अपना कार्यालय निर्मित कराकर उसका उदघाटन इं. दिनेश प्रसाद सिंह से 22.3.88 को कराया। वर्ष 1944-95 में संघ की जलापूर्ति हेतु मोटर वाटर पम्प की व्यवस्था की गयी। आगरा क्षेत्र की ओर से पेय जल हेतु वाटर-कूलर लगवाया गया। 1996 में संघ भवन के पीछ्ले हिस्से में प्रथम तल के बरामदे के साथ कमरों का भी निर्माण प्रतापगढ़ जनपद के सौजन्य से कराया गया। लक्ष्मी नारायण उपागर भी 1996 में बना।

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