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इसमें केन्द्रीय मंत्री परिषद के सभी सदस्यों के अतिरिक्त प्रत्येक क्षेत्रीय कार्यकारिणी
समिति के क्षेत्रीय अध्यक्ष एवं क्षेत्रीय महामंत्री भी शामिल है । इसका कार्यकाल भी
दो वर्ष है ।
केन्द्रीय मंत्री परिषद में वर्तमान में ३५ पदाधिकारी हैं जिनमें से निवर्तमान अध्यक्ष
एवं निवर्तमान महामंत्री पदने सदस्य होते हैं । शेष ३३ पदों में चार पद मनोनयन से तथा
२९ पद सामान्य निर्वाचन से भरे जाते हैं । मनोनयन के पद हैं - अति. महामंत्री, मंत्री-भवन,
मंत्री-वितरण, एवं सम्पादक । जो २९ पद निर्वाचन से भरे जाते हैं वो क्रमवार इस प्रकार
हैं :-
संघ की सदस्यता:-
लो. नि. वि. में कार्यरत कोई भी डिप्लोमा इंजीनियर जो जू. इं. अथवा उसे प्रोन्नति प्राप्त
किसी भी उच्च स्तर पद हो, इस संघ की आजीवन सदस्यता ग्रहण कर सक्त है । इसके साथ ही
अन्य संवर्गो से प्रोन्नति प्राप्त करके जो जू. इं. पद पर कार्यरत हों वह संघ का सदस्य
बन सकता है ।
इस संघ के सबसे पहले आजीवन सदस्य बने थे इं. शेखर चन्द्र जैन । वर्तमान में संघ कि
आजीवन सदस्यता शुल्क मात्र २०१/- रुपये है । इस संघ कि वार्षिक सदस्यता भी है जो मात्र
३०/- प्रतिवर्ष जमा करके प्राप्त की जा सकती है । यह सदस्यता एक कलैण्डर वर्ष के लिये
ही अनुमान्य है जब तक की वह पुन: अपनी वार्षिक सदस्यता का नवीनीकरण न करा ले ।
संघ का विकेन्द्रीकरण :-
हमारा यह संघ पहले से ही चार क्षेत्र में बटा था । पूर्व, पश्चिम, मध्य एवं पर्वतीय
क्षेत्र । परन्तु सा. नि. विभाग को भी १९८० में चार क्षेत्रों में बाँट दिया गया था
। तभी संघ ने यह निर्णय लिया कि जैसे- जैसे विभागीय स्तर पर क्षेत्रीय मुख्य अभियंता
कार्यालय स्थापित हो जायेंगे उसी अनुसार संघ भी प्रत्येक क्षेत्रीय मुख्य अभियंता क्षेत्र
पर अपना क्षेत्रीय संघठन स्थापित करता चला जायेगा । पहले पूर्वी क्षेत्र में फ़ैज़ाबाद,
गोरखपुर, एवं वाराणसी कमिश्नरी शामिल थी , तो मध्य क्षेत्र में इलाहाबाद, लखनऊ एवं
झाँसी । इसी प्रकार पश्चिमी क्षेत्र में कुमाऊँ एवं गढ़वाल कमिश्नरी । १९८५ में विभाग
के बरेली, कानपुर, तथा कुमाऊँ नए क्षेत्र बनें । संघीय स्तर पर पूर्वी क्षेत्र में
वाराण्सी, गोरखपुर, मध्य क्षेत्र में फ़ैज़ाबाद व लखनऊ, दक्षिण- मध्य क्षेत्र में बरेली,
मुरादाबाद , पश्चिमी क्षेत्र में आगरा व मेरठ तथा गढ़वाल व कुमाऊँ अलग- अलग क्षेत्र
बने । १९८७ में विभाग में पुन: विकेन्द्रीकरण कुल १४ क्षेत्रों में हो गया । माह नवम्बर,
२००० में उत्तर प्रदेश से उत्तरांचल अलग होकर अलग राज्य के रूप में गठित हुआ । जिसमें
कुमाऊँ एवं गढ़वाल क्षेत्र उक्त राज्य के अंग हो गए । इस तरह अब उत्तर प्रदेश लो. नि.
वि. , कुल १२ क्षेत्रों में विकेन्द्रित है ।
प्रत्येक क्षेत्रीय कार्यकारिणी का मुख्यालय, क्षेत्रीय मुख्य अभियंता के मुख्यालय पर
स्थित है । संघ के वर्तमान संविधान के अनुसार प्रत्येक क्षेत्रीय कार्यकारिणी
में ५ पद स्वीकार है ।१- क्षेत्रीय अध्यक्ष २- क्षेत्रीय महामंत्री ३- क्षेत्रीय उपाध्यक्ष
४- क्षेत्रीय मंत्री वित्त ५- क्षेत्रीय अध्यक्ष मंत्री लेखा । इनका कार्यकाल सामान्यत:
२ वर्ष है । प्रत्येक क्षेत्र अध्यक्ष एवं क्षेत्र महामंत्री का मुख्यालय क्षेत्रीय
मुख्य अभियंता के मुख्यालय पर ही रहेगा तथा ये दोनों पदाधिकारि अपने कार्यकाल तक अनिवार्य
रुप से अकार्यकारी पदों से सम्बध्द रहेंगे |
संघ के संविधान में २३ जनवरी १९८८ को किये गये संषोधनोपरान्त अब पूरे प्रदेश को चार
अंचलों में केन्द्रीक्रित किया गया है । उक्त ११ क्षेत्रों को निम्न प्रकार अंचलों
में जोड़ा गया ।
१- पूर्वी अंचल - वाराण्सी, गोरखपुर, फ़ैज़ाबाद एवं आज़मगढ क्षेत्र
२- मध्य अंचल - इलाहाबाद, कानपुर, लखनऊ व झाँसी क्षेत्र
३- पश्चमी अंचल - बरेली, मेरठ, आगरा क्षेत्र
४- पर्वतीय अंचल - कुमाऊँ एवं गढ़वाल क्षेत्र
वर्ष १९९७ में तीन नए क्षेत्रों के गठन व उत्तरांचल राज्य (कुमाऊँ गढ़वाल क्षेत्र)
के अस्तित्व में आने के पश्चात अब क्षेत्रों को निम्न प्रकार तीन अंचलों में जोड़ा
गया ।
१- पूर्वी अंचल - वाराणसी, गोरखपुर फ़ैज़ाबाद एवं आज़मगढ क्षेत्र ।
२- मध्य अंचल- इलाहाबाद, कानपुर झाँसी व मध्य क्षेत्र (लखनऊ)
३- पश्चिमी अंचल- उ. प्र. क्षेत्र बरेली, मेरठ, आगरा, मुरागाबाद क्षेत्र ।
अंचल के बेहतर पर्वेक्षण हेतु संविधान में प्रत्येक अंचल में एक अंचल उपाध्यक्ष एवं
एक उपहामंत्री (अंचल) क पद स्रुजित किया गया ।
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